नाम किसी का जो भी आए, संज्ञा उसे सदा तुम जानो,
व्यक्ति, वस्तु या कोई स्थान, सत्य यही बस तुम मानो।
नाम हटाकर जो लग जाए, शब्द वही सर्वनाम कहाता,
मैं, तुम, वह और उसका—यह, सबका नाता है समझाता।
कैसा है या कितना है जो, वह विशेषण बतलाता है,
रंग, रूप या गुण-दोषों को, सुन्दरता से दर्शाता है।
हँसना, रोना, पढ़ना, लिखना, क्रिया सिखाती सारा काम,
बिना किए कुछ काम जगत में, मिलता कभी नहीं आराम।
जो न बदले रूप कभी भी, अव्यय उसको ही तुम मानो,
किन्तु, परन्तु, और, तथा को, अपरिवर्तित ही तुम जानो।
जो जोड़ें शब्दों का नाता, वे ही कारक कहलाते,
ने, को, से, में, पर—मिलकर, सुन्दर वाक्य सदा बनाते।
© अभिषेक तिवारी
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