अपेक्षा! हृदय के इस मरुथल की, वह तरल छलना है,
जहाँ तृष्णा की मदिरा पी, विवश केवल पिघलना है।
शून्य के इस महासागर में, जो नौका ढूँढते पराई,
उन्हें उपहार में मिलती, चिरंतन दुख की गहराई।
माना कि ये चंचल विचार, अब वश में नहीं रहते,
नियंत्रण खो चुका मन भी, अश्रु की धार में बहते।
न चित्त पर कोई अंकुश, न इन्द्रियों पर वश रहा,
विषय-भोग की मृगतृष्णा में, सारा संयम बह रहा।
अपेक्षा का वह भग्न स्वप्न, अंतर्दाह बन जाता है,
मृदुल चेतना के उपवन में, प्रलय राग यह गाता है।
मूर्छित होती है संवेदता, जब आस के तंतु टूटते,
झंझावात सा वेग प्रबल, जब निज आधार ही छूटते।
पर क्यों पराई बाहुओं में, तुम सुख का स्वप्न बुनते हो?
क्यों स्वयं के कंठ में ही, हलाहल विष को चुनते हो?
तज दो इस मोह-पाश को, जो जकड़े है प्राणों को,
उठो! पहचानो स्वयं में छिपे, उन अजेय विधानों को।
अगर करनी है कोई आस, तो अपनी ही कसौटी लो,
स्वयं की अग्नि में तपकर, सुवर्ण सी विभूति लो।
जब उर में उदित होगा, प्रखर आत्म-विश्वास का सूर्य,
तब थमेगा इस मरुथल में, विवशताओं का क्रूर तूर्य।
जहाँ न कोई पर-अपेक्षा, न टूटने का भय होगा,
अविचल आनंद का सागर, वहीं चिर-विजय होगा।
© अभिषेक तिवारी
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