Monday, 29 January 2018

कॉन्फेशन

क्या हाल भाई लोग, सब ठीक - ठाक ?
अबे यार तुमलोगों को कुछ बताना था बे- साला सोचे थे, सबसे पहले बाहर निकल रहे हैं, मस्त इंजीनियर डॉक्टर टाइप यो-यो दोस्त बनाएँगे। लेकिन का करें - 'शार्ट हैण्ड जब लिखा लीलारा, तव का करीहें अवधेश कुमारा'।
तुम लोग रह ही गए बे, सही कहें तो पीछा ही नही छुड़ा पाए भाई।
नही, मतलब देखो कौनो साला काम का है ?
सब क्युटिया टाइप हैं, लेकिन पता नही क्यों ये बात साला कौनो और बोल दे तो बर्दास्त से बाहर हो जाता है। मन करता है "रेन कम वॉटर कम" कर दें।
साला बहुत घूमे बे कहाँ - कहाँ नही गए लेकिन घूम फिर के तुम्ही लोगो मे रह गए यार । साला हऊ का कहते हैं - एक्सेंट, तक नही सुधरा जहाँ जाते हैं लोग पूछ देते हैं भाई गोरखपुर साइड के हो क्या ?
शुरू में जब ईगो पे ले लीये थे तब तनी बुरा लगता था कि पहिचाना कैसे बे, बोल तो हम हिन्दीये रहे थे।
लेकिन देखो साला यहां भी खेल गयी किश्मत आज जब कई भाषा पढ़ लिए, अरे भाषा छोड़ो यहां कई सेमेस्टर लिंगविस्टिक पढ़ने के बाद अब लगता है कि यार जो मज़ा खींच के बोलने में हैं उ कहीं और, है नही।
एकाध समय फॉर्मेलिटी में छोड़ दें तो गुरु अब हमशे हो भी न पाएगा।
बड़ा दम लगता है यार बना के बोलने में मज़े नही आता हऊ का कहते हैं फील नही आता, नेचुरल फ्लो नही आता।
आ जिसको ई नेचुरल फ्लो पसन्द नही आता उ हमको पसन्द नही आता।
तुमलोग साला प्यार नही मजबूरी हो बे कोनो और टाइप वालन से ज्यादा जमता ही नही। अउर तुम लोगों से जल्दी खटकता ही नही आ कब्बो खटक जाए साला तो साला डर लगता है अलग से कि बेटा महफील में बहुत मौज ली जाएगी।
और हऊ कहावत 'हम' जोन कहते हैं, "महफील का फूफा होने से अच्छा मजबूरी का गांधी बन जाओ।"  बस इसी
का पालन कर के दाब लेना ही बेहतर समझते हैं।
का किश्मत है हमारी, इत्ते रात गए जब दुनिया बाबू सोना कर के सो गई है  या सोने वाली होगी तब साला तुम लोग की याद आ रही है, कि कितने बड़े वाले हैं सब
कब्बो नही सुधरेंगे सब।

बेटा आज फ्लो में हैं चाहें जित्ता लिख दें, लेकिन का फायदा किसके लिए लिखें साला पढ़ेगा कौन, जिनको पढना है साला स्क्रोल कर - कर के नीचे खोज रहे होंगे -

"देखबे बे कोनो के बड्डे ह का मोटका बड़ा ढेर लिख देहलस।
ना बे आज-काल ढेर ज्ञान देता उ।
जानत नइखे- ओकर कारे इहे ह।
हाँ उ नशीहत देके दुनिया के अपने सुत्तल होइ।
ई बात सही कहले ह।
का बात कर ताड़े सही में?
फोन करबअ सो।
का फायदा, उठइबे ना करी।
चल सो घरवे ओकरे।
ए मह तोहनी के चला जा तनी हम आवतनी घरवाँ से होके।
तोहरा ढेर कार रहेला, चुपचाप चलअ नाटक न बतियावअ।
हाँ बे चला सो कही घूमे चलेके- पनियहवाँ चले के?
हाँ बे हम आज ले ना गइल बानी ।
तू रहेदअ तोहरे मान के नाही बा।
आज केकर खर्चा बा।
बेटा तोहके बड़ा ढेर फिकर रहता,
का बनवावअ तड़अ?

अभिषेक ,अभिषेक , बाड़ा हो ,केतना सुतबअ ए मह ?
छोटू, छोटू... ,उठ बे, का बाबू रात भर जगाई भइल है का?"

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 28 July 2017

मुझे जीना नही आता

मुझे जीना नही आता,
ज़िन्दगी जब तक मुझे एक दो पठखनियाँ नही दे देती मेरी धमनियों में उबाल नही आता,
पठखनी दर पठखनी ससख्त होता जाता हूँ।
फिर ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीने निकल पड़ता हूँ,
बेख़बर बेपरवाह तब तक जब तक, ऐ ज़िन्दगी फिर कोई करारा जवाब नही मिल जाता।
-
अभिषेक तिवारी।

मुझे प्रेम करना नही आता

मुझे प्रेम करना नही आता, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही रहता स्वयं पर नियंत्रण अपराधबोध से दब सा जाता हूँ।
न जाने क्यों धमनियों में अंगार दौड़ने लगता है और फिर अचानक लगने लगता है कि - काश! तुमसे मिला ही न होता, न की होती कोई बात, न दिखाए होते दिल के जज़्बात।
मैं तुझसे तू मुझसे बेख़बर, करते हम स्वप्न ही में बात।
नही देना होता बोल - बोल कर प्रेम का प्रमाण, चुप-चाप बिन कहे ही रखता ख़्याल तुम्हारा, ना तुम मुझे बदलती न मैं तुम्हे बदलता बस एक मुस्कान पर तुम्हारी ये दिल पतझड़ के सूखे पत्तों सा बिछ जाता।
नही आता मुझे रूठना - मनाना और ना ही तुम्हारी सुंदरता के कशीदे पढ़ कर सुनाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
खो देता हूँ अपने को अपने आप से, आँखों से आँसू भी नही आते, शायद भाप बन जाते हैं शरीर के ताप से।
एक ज्वाला सी उठती है मन मे और जला देती है स्वप्न सारे, दिन रात लगने लगते हैं किसी शाप से।
नही आता दिल चीर कर सिया- राम दिखाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही आता सब कुछ अर्पण कर तर्पण करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है
मुझे नही आता प्रेम करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।

-
अभिषेक तिवारी

Friday, 27 January 2017

मैं सच बोलता हूँ।

जी हाँ, मैं सच बोलता हूँ।
सुनता कोई नहीं फिर भी रोज बोलता हूँ।
पत्थरों में भगवान देखता हूँ लेकिन इंसानो में नाम देखता हूँ।
कभी धर्म देखता हूँ कभी जाति देखता हूँ, कभी रंग देखता हूँ कभी ढंग देखता हूँ।
मैं न कर्म देखता हूँ न ईमान देखता हूँ,
क्यों न मैं इंसानो में इंसान देखता हूँ?
सबको मैं कई तरह से कई बार तोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हर रोज़ एक स्वप्न देखता हूँ, स्वप्न में सारा जहाँन देखता हूँ और स्वयं को ही सबसे महान देखता हूँ।
सारा जहाँन देखता हूँ स्वयं का छोड़ सबका मकान देखता हूँ।
सबकी जीत देखता हूँ, सबकी हार देखता हूँ,
मैं न स्वयं के ह्रदय की रार देखता हूँ,
क्यों न मैं सब के घर को अपना मकान देखता हूँ?
मैं तो सब के घरों में झांक सभी के राज़ खोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

आ गए चुनाव मैं इनका उनका सबका खाता हूँ,
मिल जाये कुछ तो घर भी लाता हूँ।
न दल देखता हूँ न व्यापार देखता हूँ,
न विचार देखता हूँ न सम्मान देखता हूँ।
मैं धर्म और जाति में ही सबकी पहचान देखता हूँ,
क्यों न मैं सभी दलों के काम देखता हूँ?
अजी आप दाम तो बोलो मैं तो स्वयं को ही मोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हुआ बेटा नगाड़े बजा मिठाई बाँटता हूँ,
हो गयी बेटी जो मुँह बना कर्ज़ माँगता हूँ।
कभी परंपराओं तो कभी समाज को कोसता,
निज दोष न पाता, स्वयं को समाज से अलग सोचता हूँ।
बेटी को बेटे से कम देखता हूँ,
क्यों न मैं बेटा-बेटी एक सम देखता हूँ?
अजी छोड़ो भी, मैं तो इंसान हूँ स्वयं को छोड़ सबको टटोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 7 October 2016

प्रेम में मिलन

उधेड़बुन में हूँ कि क्या मिलना भी उतना ही रोमांचकारी होता होगा,
जितनी कि कल्पनाएँ होती हैं।
चकोर को चाँद मिल जाए तो क्या होगा ?
शायद कुछ नए प्रतिमान बनेंगे।
परंतु क्या ये प्रतिमान चकोर की वर्षों से की तपस्या से न्याय कर सकेंगे ?
क्या सुदूर चाँद के प्रति चकोर के उस निश्छल प्रेम को मिलन के प्रतिमानों में बाँधा जा सकता है ?
मिलन प्रेम की परिणति हो ही नही सकती
तभी तो राधा-कृष्ण ने चाँद-चकोर ही रहना स्वीकार कर लिया।
सीता ने भी राम से अलग होकर ही अपने प्रेम को अमर किया।
प्रेम में मिलन तो एक आकांक्षा मात्र है, एक अनन्त की भाँति, जिसे मिलन के प्रतिमानों में बाँधा ही नही जा सकता।
प्रेम अनन्त है और यदि प्रेम की परिणति मिलन है,
तो वो कैसा अनन्त जिसका अंत मिल गया हो।

- अभिषेक तिवारी।

Monday, 3 October 2016

मिलन

एक शख़्स जाना-पहचाना सा पर शख़्सियत अनजानी सी।
कई वर्षों से ढूंढ़ रहा था जिसको मिलना है अब उसको।
क्या कहूँगा उसको मिल न पाया आज तक स्वप्न से बाहर जिसको।
बहुत कुछ सोचा है: उर का हर एक स्पंदन सुना दूँगा उसको।
कहूँगा देख प्रिये! न डिगा पाई ये लम्बी प्रतीक्षा भी मुझको।
और बहुत कुछ है कहने को पर अब सोच-सोच कर बोलना बेमानी लगता है।
केवल उसके अन्दाज़-ए-ज़ुस्तज़ु को ही देखा था नही कर पाया था कभी गुफ़्तगू शायद इसीलिए ये आसमानी लगता है।
वो ललाती साँझ के नभ की अकेली तारीका सी थी, और आज पावस की सजला बदली सी मेघमय आसमान से उतर कर बढ़ रही है मेरी ओर।
पर न जाने क्यों अब भी कटी पतंग सी लग रही, नही है जिसकी मेरे पास कोई डोर।
शायद अब भी वो एक चाँद है और मैं एक चकोर,
मिलन संभव नही, बढ़ रहा हूँ अब भी एक अनंत की ओर।
-अभिषेक तिवारी

Monday, 12 September 2016

स्त्री विमर्ष- एक अधूरी कहानी

बात कल रात की है अइसे ही बइठे थे, कुछ सोच रहे थे, आ सोच का रहे थे परेशान टाइप थे। अचानके से हमारे एक बड़े अच्छे मित्र- हाँ जी! उहे हाल्फ पाइंट वाले इयार आये, बड़े परेशान लग रहे थे बेचारे। अब हम बड़ा संकोच में कि पिछले लगन में इन्हीं भाई की शादी थी, न गइबे किये न नेवतवे भिजवाये, अब ससुरा शूरू कहाँ से करें । खैर जरूरते नही पड़ी खुदे बोल पड़े भाई अच्छा किया जो तू न आया लगन में हमारे। हमने पूछा हुआ क्या थोड़ा डिटेल में बताओ बीवी ठीक ठाक तो है न । इतना कहना था की भाई रोक नही पाये अउर दिल के अरमान आंसू नेटा सब में मिक्स हो के बहने लगे, हमने ढांढस बढ़ाने की कोशिशो की लेकिन अरमान कुछ ढेरे लग रहे थे सो हमने अपना रुमाल कुर्बान कर ही दिया, रुमाल बढ़ाते हुए बोले अब लड़कों की तरह रोओ नहीं और लड़कियों की तरह बुलंद अवाज़ में आप बीती सुनाओ।
भाई जो कहानी सुनाये हैं रोंगटवे खड़ा हो गया।
उहे सब तो सोच के परेशान बैठे थे इ मारे कि दिलवे दहला दिए...
                           
दरअसल हुआ ये था कि हम आज कल हई जो नया ट्रेंड चला है न "बहुओं से गोल्ड मांगने वाले अब बेटियों से गोल्ड की आस लगाएं हैं " टाइप मैसज इहाँ - उहाँ पहुचाने वाला उसी पर सोच रहे थे कि ससुरा इ आस कौन लगाता है या फिर ये गोल्ड कौन मांगता है, जो मांगता है उसका जेंडर क्या है साला बड़ा जुलुम हो रहा है समाज में स्त्री जाति के साथ । फिर अचानके दिमाग में आया कि गोल्ड जो लड़की वालों कि तरफ से देता है उ कौन जेंडर से है, खाली एक विशेस जेंडर को ही इन सब चीज से परेसानी हो रहा है कि सबै परेशान है।
तब्लके इ आ गए थे, अरे उहे हमारे मित्र जो अपना अरमनवा नही कंट्रोल कर पाये थे।
हुआ इ था उनके साथ कि शादी तय हुई थी इनकी 5 लाख नकद और 1 कार पर और जब तिलक चढ़ा तो कार तो मीले गया लेकिन नक़दी का कोनो बाते नही हुआ। अब बबुआ की मम्मी मुँह फुला के बैठी थीं कुछो नीक नही लग रहा था न साड़ी कपड़ा न फल फूल मिठाई। जइसे तइसे बबुआ के पापा समझाए त मने तिलक चढ़ा । लेकिन बबुआ के मम्मी का फ़ाइनल वाला डेसीजन था अब लइका हमारा तब्बे द्वारपूजा पे बैठेगा जब नकद गिना जायेगा। इधर बाबू त फोने पे चालू थे "मेला बाबू मेला सोना" 7 कसम त छोड़िये इ 72 गो ले कसम खा चुके थे । जोन हिसाब से बता रहे थे बड़ी गहरा प्यार हुआ लगता था, लेकिन भईया अब मम्मी के आगे थोड़े न बोल सकते थे कुछु।
बियाह वाला दिन पहुँचे हुआँ जनवासे पे सब लोग, आ हुआ समधी जी लोग में एक जोड़।
बबुनी के पापा बबुआ के पापा से बोले हम 5 लाख और गाड़ी कहे थे त गाडी दे दिए और बियाह में खर्चा आ तिलक का सामान ले के कुल 4 से उप्पर गिर गया है तब्बो 1 लाख दे रहे हैं रख लीजिये आ चलिए दरवाजे पे। अब बबुआ के पापा का तो मानो तारे छोड़ दिया हो कुछ समझ नही आया तो निकाले मोबाईल मिला दिए बबुआ की मम्मी को और फ़ोन आ पकड़ा दिए समधी जी को, लीजिये तनी जवन हमसे कहे हैं उहे बतिया दोहरा दिजिये।
उधर बबुआ सोच रहे थे कि जोन कपड़ा पहिन के परछावान करवाये हैं ओही पे जयमाल कराएं कि बदल लें फेर सोचे जुठहि दिमाग लगा रहे हैं फोन मिला ही लेते हैं, अरे उहें- "मेला बाबू मेला सोना"।
आ फोन मिलाये आ मिला भी, लेकिन आवाज़ बड़ा धांसू टाइप था एकदम लड़की वाला बुलंद आवाज़, "कुछो मर्दानगी है कि नही आप में कि जिंदगी भर मम्मी का अँचरा पकड़ के ही बैठना है अरे बियाह आपको करना है आ हम पसंद हैं तो बार बार मम्मी को काहे पूछ रहे हैं" टूँ टूँ टूँ ... फ़ोन कट गया।
आ उधर समधी लोग मारे पशीना के भींज रहे थे ।
बबुआ के पापा बोल दिए थे की जवन बतियाना है मैडम से बतिया लीजिए हम नही जान रहे हैं कुछो।
बबुआ को अपने बहिन से पता, लगा मामला पूरा मिलाये फ़ोन मम्मी को अपने आ कहे काहे परेसान हो मम्मी हम कमा रहे हैं न का गम है इन लोग के पैसा पे थोड़े जिनगी कटेगा।
अब मम्मी पूरा फॉरम में, हमारा एक्के बेटा है नही लेंगे त दू - दू  गो बेटी का बियाह करना है कैसे होगा। भुला गए आये थे लोग तिलक में त कह गए थे लोग कि 'सहाना' में कमी नही करियेगा आँगना में सब रिस्तेदार सब रहेगा इज्जत अब आपे के हाथ में है त 3 लाख का गहनवे बनवा दिए 1 लाख का साड़ी भेजे हैं 5 लाख तिलक में खर्चा हो गया
आ अभी सब रिश्तेदार का बिदाई बकिये है। तुम चुप चाप कान खोल के सुन लो...
जब तक पइसा पूरा नही गिना जाता तब तक नही जाना है दरवाजे पे ।
अबे इ सब खेला हो ही रहा था कि एक गाड़ी भर के नारी शक्ती पहुँच गयी जनवासे पे। बबुआ आ बबुआ के पापा पेश हुए, बताया गया कि इ बबुनी की मौसी हैं आ जिला महिला प्रकोष्ठ की नेता हैं। बबुआ के पापा बोले कोनो पकोष्ठ के नेता हो पैसा दिलवा दें राज़ी ख़ुशी बियाह हो । अब ता नेता जी का चेहरा लाल बोल पड़ी अभी जान नही रहे हैं आप लोग हम कौन हैं मेरी बेटी की शादी है इसीलिए अभी तक चुप थे लिकिन आप लोग ता सर पर चढ़ रहे हैं। चुप चाप दरवाजे पे चलिए शादी करीये खाना खाइये और बहू को बिदा करा के घर ले जाइये। बबुआ चुपचाप तमाशा देख रहे थे कि बबुआ का मोबाइल बोला निकाले तो देखे मम्मी का फ़ोन था । फ़ोन उठाये ता एक्के आवाज सुनाई दिया गिना गया का पैसवा, जी अभी नही मम्मी, अभी बात चल रहा है। बात का करना है वापस ले आओ बारात तानी दो त फोनवा अपने पापा को, "काजी का बतिया रहे हैं पैसा दें ता ठीक नही तो वापस आइये", इ बोले, तुम नही समझ रही हो अब जब पैसा का जुगाड नही किये हैं ता कहाँ से इ बेरा ले आएंगे अब्बे 1 लाख ले लेते हैं और पैसा देंगे ता गौना करा लेंगे, का कहती हो, "जोन बुझाये तौन किजिये फेर बाद में हमसे मत कहियेगा कुछु जब सब खुदेही करना है ता हमशे का पूछ रहे हैं, गए हैं नया मर्दानी पहिन के कर लीजिये बेटा का बियाह देख रहे हैं दो - दो गो बेटी का बियाह कैसे करेंगे बिना पैसा का।"
अब ता बबुआ के पापा लाचार टाइप हो गए, आ बोल दिए अपने समधी जी से भइया पैसा का ब्यवस्था हो तो बताइये नही तो माफ़ करिये।
ऐसे कैसे माफ़ करिये निकलीं बबुनी की मौसी अपना बड़का मोबाइल आ मिलाई कही फ़ोन आ बोलीं शादी में पैसा घट गया है बिना दहेज़ शादी नही हो रही है बारात वापस जा रही है जल्दी से आइये।
अब तनी सा बबुआ के पापा के जान में जान आया चला लगता है पैसा आ रहा है।
10 मिनट में आई 3 गाड़ी पुलिस आ बाराती लोग को दे लाठी दे लाठी, बबुआ आ उनके पापा को ले गयी उठा के हुआ बियाह, बियाहे काहे गौनवो हो गया । 1 लाख मिल रहा था तौनो गया हाथ से।
अब पहुचे लोग घर ले के बहुरानी, हुआ मुलाकात सास बहू का, बुझा रहा था कि अगर शाकाहारी न होती ता चबा जातीं। अब रोज कच कच हो रहा है घर में कब्बो इ कहती है इसको मइके छोड़ आ आओ कब्बो इ कहती हैं दहेज़ उत्पीड़न लगवा देंगे।
इहे समस्या ले के हमारे पास आये थे इ हमारे मित्र। हम ता बोल दिए भैया हमको माफ़ करो इ नारी नारी का झगड़ा है खुदे सुलझा लेंगी हम बीच में पड़े तो नारी उत्पीड़न हो जायेगा।
अभिषेक तिवारी।