Friday, 28 September 2018

अंतःद्वंद

मुद्दतों हुए ख़ुद से मिले, जाने कहाँ भटक रहा हूँ।
आग का दरिया है या समंदर, जल रहा हूँ या गल रहा हूँ
या कि खो गया हूँ किसी निर्वात में
साँसे तो हैं पर कोई आवाज़ नही
दिल तो है पर पूरे जज़्बात नहीं
कुछ ख़्वाहिशें भी हैं पर उनमें वो बात नही
अब धड़कनें भी कुछ नही कहतीं उनमें भी कोई राज़ नही
फिर भी मुस्कुरा रहा हूँ, हर रिश्ता निभा रहा हूँ
मैं अपना ग़म स्वयँ से ही छिपा रहा हूँ।
शायद स्वप्न में हूँ, कोई भी बन्धन नही तोड़ पा रहा हूँ
या कि कमज़ोर हो गया हूँ, स्वयँ का भी बोझ नही उठा पा रहा हूँ लेकिन,
कमज़ोर होना तो मेरी फितरत ही नही, मैं क्या से क्या हो रहा हूँ
मुद्दतों हुए ख़ुद से मिले, जाने कहाँ भटक रहा हूँ।

कब और कैसे भटका, अब खोज़ रहा हूँ मैं
क्या, कब, कहाँ और क्यों, इन प्रश्नों से उलझ रहा हूँ मैं
ख़ुद से कब मिलूँगा, अब सोच रहा हूँ मैं लेकिन,
भटकना तो फितरत है मेरी, फिर क्यों डर रहा हूँ मैं
शायद यही ज़िन्दगी है और मौज कर रहा हूँ मैं।
नही खोया निर्वात में ना ही स्वप्न में हूँ
इसी दुनिया मे हूँ और दुनियादारी सीख रहा हूँ मैं।

- अभिषेक तिवारी

Monday, 29 January 2018

कॉन्फेशन

क्या हाल भाई लोग, सब ठीक - ठाक ?
अबे यार तुमलोगों को कुछ बताना था बे- साला सोचे थे, सबसे पहले बाहर निकल रहे हैं, मस्त इंजीनियर डॉक्टर टाइप यो-यो दोस्त बनाएँगे। लेकिन का करें - 'शार्ट हैण्ड जब लिखा लीलारा, तव का करीहें अवधेश कुमारा'।
तुम लोग रह ही गए बे, सही कहें तो पीछा ही नही छुड़ा पाए भाई।
नही, मतलब देखो कौनो साला काम का है ?
सब क्युटिया टाइप हैं, लेकिन पता नही क्यों ये बात साला कौनो और बोल दे तो बर्दास्त से बाहर हो जाता है। मन करता है "रेन कम वॉटर कम" कर दें।
साला बहुत घूमे बे कहाँ - कहाँ नही गए लेकिन घूम फिर के तुम्ही लोगो मे रह गए यार । साला हऊ का कहते हैं - एक्सेंट, तक नही सुधरा जहाँ जाते हैं लोग पूछ देते हैं भाई गोरखपुर साइड के हो क्या ?
शुरू में जब ईगो पे ले लीये थे तब तनी बुरा लगता था कि पहिचाना कैसे बे, बोल तो हम हिन्दीये रहे थे।
लेकिन देखो साला यहां भी खेल गयी किश्मत आज जब कई भाषा पढ़ लिए, अरे भाषा छोड़ो यहां कई सेमेस्टर लिंगविस्टिक पढ़ने के बाद अब लगता है कि यार जो मज़ा खींच के बोलने में हैं उ कहीं और, है नही।
एकाध समय फॉर्मेलिटी में छोड़ दें तो गुरु अब हमशे हो भी न पाएगा।
बड़ा दम लगता है यार बना के बोलने में मज़े नही आता हऊ का कहते हैं फील नही आता, नेचुरल फ्लो नही आता।
आ जिसको ई नेचुरल फ्लो पसन्द नही आता उ हमको पसन्द नही आता।
तुमलोग साला प्यार नही मजबूरी हो बे कोनो और टाइप वालन से ज्यादा जमता ही नही। अउर तुम लोगों से जल्दी खटकता ही नही आ कब्बो खटक जाए साला तो साला डर लगता है अलग से कि बेटा महफील में बहुत मौज ली जाएगी।
और हऊ कहावत 'हम' जोन कहते हैं, "महफील का फूफा होने से अच्छा मजबूरी का गांधी बन जाओ।"  बस इसी
का पालन कर के दाब लेना ही बेहतर समझते हैं।
का किश्मत है हमारी, इत्ते रात गए जब दुनिया बाबू सोना कर के सो गई है  या सोने वाली होगी तब साला तुम लोग की याद आ रही है, कि कितने बड़े वाले हैं सब
कब्बो नही सुधरेंगे सब।

बेटा आज फ्लो में हैं चाहें जित्ता लिख दें, लेकिन का फायदा किसके लिए लिखें साला पढ़ेगा कौन, जिनको पढना है साला स्क्रोल कर - कर के नीचे खोज रहे होंगे -

"देखबे बे कोनो के बड्डे ह का मोटका बड़ा ढेर लिख देहलस।
ना बे आज-काल ढेर ज्ञान देता उ।
जानत नइखे- ओकर कारे इहे ह।
हाँ उ नशीहत देके दुनिया के अपने सुत्तल होइ।
ई बात सही कहले ह।
का बात कर ताड़े सही में?
फोन करबअ सो।
का फायदा, उठइबे ना करी।
चल सो घरवे ओकरे।
ए मह तोहनी के चला जा तनी हम आवतनी घरवाँ से होके।
तोहरा ढेर कार रहेला, चुपचाप चलअ नाटक न बतियावअ।
हाँ बे चला सो कही घूमे चलेके- पनियहवाँ चले के?
हाँ बे हम आज ले ना गइल बानी ।
तू रहेदअ तोहरे मान के नाही बा।
आज केकर खर्चा बा।
बेटा तोहके बड़ा ढेर फिकर रहता,
का बनवावअ तड़अ?

अभिषेक ,अभिषेक , बाड़ा हो ,केतना सुतबअ ए मह ?
छोटू, छोटू... ,उठ बे, का बाबू रात भर जगाई भइल है का?"

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 28 July 2017

मुझे जीना नही आता

मुझे जीना नही आता,
ज़िन्दगी जब तक मुझे एक दो पठखनियाँ नही दे देती मेरी धमनियों में उबाल नही आता,
पठखनी दर पठखनी ससख्त होता जाता हूँ।
फिर ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीने निकल पड़ता हूँ,
बेख़बर बेपरवाह तब तक जब तक, ऐ ज़िन्दगी फिर कोई करारा जवाब नही मिल जाता।
-
अभिषेक तिवारी।

मुझे प्रेम करना नही आता

मुझे प्रेम करना नही आता, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही रहता स्वयं पर नियंत्रण अपराधबोध से दब सा जाता हूँ।
न जाने क्यों धमनियों में अंगार दौड़ने लगता है और फिर अचानक लगने लगता है कि - काश! तुमसे मिला ही न होता, न की होती कोई बात, न दिखाए होते दिल के जज़्बात।
मैं तुझसे तू मुझसे बेख़बर, करते हम स्वप्न ही में बात।
नही देना होता बोल - बोल कर प्रेम का प्रमाण, चुप-चाप बिन कहे ही रखता ख़्याल तुम्हारा, ना तुम मुझे बदलती न मैं तुम्हे बदलता बस एक मुस्कान पर तुम्हारी ये दिल पतझड़ के सूखे पत्तों सा बिछ जाता।
नही आता मुझे रूठना - मनाना और ना ही तुम्हारी सुंदरता के कशीदे पढ़ कर सुनाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
खो देता हूँ अपने को अपने आप से, आँखों से आँसू भी नही आते, शायद भाप बन जाते हैं शरीर के ताप से।
एक ज्वाला सी उठती है मन मे और जला देती है स्वप्न सारे, दिन रात लगने लगते हैं किसी शाप से।
नही आता दिल चीर कर सिया- राम दिखाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही आता सब कुछ अर्पण कर तर्पण करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है
मुझे नही आता प्रेम करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।

-
अभिषेक तिवारी

Friday, 27 January 2017

मैं सच बोलता हूँ।

जी हाँ, मैं सच बोलता हूँ।
सुनता कोई नहीं फिर भी रोज बोलता हूँ।
पत्थरों में भगवान देखता हूँ लेकिन इंसानो में नाम देखता हूँ।
कभी धर्म देखता हूँ कभी जाति देखता हूँ, कभी रंग देखता हूँ कभी ढंग देखता हूँ।
मैं न कर्म देखता हूँ न ईमान देखता हूँ,
क्यों न मैं इंसानो में इंसान देखता हूँ?
सबको मैं कई तरह से कई बार तोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हर रोज़ एक स्वप्न देखता हूँ, स्वप्न में सारा जहाँन देखता हूँ और स्वयं को ही सबसे महान देखता हूँ।
सारा जहाँन देखता हूँ स्वयं का छोड़ सबका मकान देखता हूँ।
सबकी जीत देखता हूँ, सबकी हार देखता हूँ,
मैं न स्वयं के ह्रदय की रार देखता हूँ,
क्यों न मैं सब के घर को अपना मकान देखता हूँ?
मैं तो सब के घरों में झांक सभी के राज़ खोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

आ गए चुनाव मैं इनका उनका सबका खाता हूँ,
मिल जाये कुछ तो घर भी लाता हूँ।
न दल देखता हूँ न व्यापार देखता हूँ,
न विचार देखता हूँ न सम्मान देखता हूँ।
मैं धर्म और जाति में ही सबकी पहचान देखता हूँ,
क्यों न मैं सभी दलों के काम देखता हूँ?
अजी आप दाम तो बोलो मैं तो स्वयं को ही मोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हुआ बेटा नगाड़े बजा मिठाई बाँटता हूँ,
हो गयी बेटी जो मुँह बना कर्ज़ माँगता हूँ।
कभी परंपराओं तो कभी समाज को कोसता,
निज दोष न पाता, स्वयं को समाज से अलग सोचता हूँ।
बेटी को बेटे से कम देखता हूँ,
क्यों न मैं बेटा-बेटी एक सम देखता हूँ?
अजी छोड़ो भी, मैं तो इंसान हूँ स्वयं को छोड़ सबको टटोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 7 October 2016

प्रेम में मिलन

उधेड़बुन में हूँ कि क्या मिलना भी उतना ही रोमांचकारी होता होगा,
जितनी कि कल्पनाएँ होती हैं।
चकोर को चाँद मिल जाए तो क्या होगा ?
शायद कुछ नए प्रतिमान बनेंगे।
परंतु क्या ये प्रतिमान चकोर की वर्षों से की तपस्या से न्याय कर सकेंगे ?
क्या सुदूर चाँद के प्रति चकोर के उस निश्छल प्रेम को मिलन के प्रतिमानों में बाँधा जा सकता है ?
मिलन प्रेम की परिणति हो ही नही सकती
तभी तो राधा-कृष्ण ने चाँद-चकोर ही रहना स्वीकार कर लिया।
सीता ने भी राम से अलग होकर ही अपने प्रेम को अमर किया।
प्रेम में मिलन तो एक आकांक्षा मात्र है, एक अनन्त की भाँति, जिसे मिलन के प्रतिमानों में बाँधा ही नही जा सकता।
प्रेम अनन्त है और यदि प्रेम की परिणति मिलन है,
तो वो कैसा अनन्त जिसका अंत मिल गया हो।

- अभिषेक तिवारी।

Monday, 3 October 2016

मिलन

एक शख़्स जाना-पहचाना सा पर शख़्सियत अनजानी सी।
कई वर्षों से ढूंढ़ रहा था जिसको मिलना है अब उसको।
क्या कहूँगा उसको मिल न पाया आज तक स्वप्न से बाहर जिसको।
बहुत कुछ सोचा है: उर का हर एक स्पंदन सुना दूँगा उसको।
कहूँगा देख प्रिये! न डिगा पाई ये लम्बी प्रतीक्षा भी मुझको।
और बहुत कुछ है कहने को पर अब सोच-सोच कर बोलना बेमानी लगता है।
केवल उसके अन्दाज़-ए-ज़ुस्तज़ु को ही देखा था नही कर पाया था कभी गुफ़्तगू शायद इसीलिए ये आसमानी लगता है।
वो ललाती साँझ के नभ की अकेली तारीका सी थी, और आज पावस की सजला बदली सी मेघमय आसमान से उतर कर बढ़ रही है मेरी ओर।
पर न जाने क्यों अब भी कटी पतंग सी लग रही, नही है जिसकी मेरे पास कोई डोर।
शायद अब भी वो एक चाँद है और मैं एक चकोर,
मिलन संभव नही, बढ़ रहा हूँ अब भी एक अनंत की ओर।
-अभिषेक तिवारी