Monday, 9 March 2026

पद - विभेद

​नाम किसी का जो भी आए, संज्ञा उसे सदा तुम जानो,

व्यक्ति, वस्तु या कोई स्थान, सत्य यही बस तुम मानो।

​नाम हटाकर जो लग जाए, शब्द वही सर्वनाम कहाता,

मैं, तुम, वह और उसका—यह, सबका नाता है समझाता।

​कैसा है या कितना है जो, वह विशेषण बतलाता है,

रंग, रूप या गुण-दोषों को, सुन्दरता से दर्शाता है।

​हँसना, रोना, पढ़ना, लिखना, क्रिया सिखाती सारा काम,

बिना किए कुछ काम जगत में, मिलता कभी नहीं आराम।

​जो न बदले रूप कभी भी, अव्यय उसको ही तुम मानो,

किन्तु, परन्तु, और, तथा को, अपरिवर्तित ही तुम जानो।

​जो जोड़ें शब्दों का नाता, वे ही कारक कहलाते,

ने, को, से, में, पर—मिलकर, सुन्दर वाक्य सदा बनाते।

© अभिषेक तिवारी

अपेक्षा: एक मृग तृष्णा

अपेक्षा! हृदय के इस मरुथल की, वह तरल छलना है,

जहाँ तृष्णा की मदिरा पी, विवश केवल पिघलना है।

शून्य के इस महासागर में, जो नौका ढूँढते पराई,

उन्हें उपहार में मिलती, चिरंतन दुख की गहराई।

​माना कि ये चंचल विचार, अब वश में नहीं रहते,

नियंत्रण खो चुका मन भी, अश्रु की धार में बहते।

न चित्त पर कोई अंकुश, न इन्द्रियों पर वश रहा,

विषय-भोग की मृगतृष्णा में, सारा संयम बह रहा।

​अपेक्षा का वह भग्न स्वप्न, अंतर्दाह बन जाता है,

मृदुल चेतना के उपवन में, प्रलय राग यह गाता है।

मूर्छित होती है संवेदना, जब आस के तंतु टूटते,

झंझावात सा वेग प्रबल, जब निज आधार ही छूटते।

​पर क्यों पराई बाहुओं में, तुम सुख का स्वप्न बुनते हो?

क्यों स्वयं के कंठ में ही, हलाहल विष को चुनते हो?

तज दो इस मोह-पाश को, जो जकड़े है प्राणों को,

उठो! पहचानो स्वयं में छिपे, उन अजेय विधानों को।

​अगर करनी है कोई आस, तो अपनी ही कसौटी लो,

स्वयं की अग्नि में तपकर, सुवर्ण सी विभूति लो।

जब उर में उदित होगा, प्रखर आत्म-विश्वास का सूर्य,

तब थमेगा इस मरुथल में, विवशताओं का क्रूर तूर्य।

​जहाँ न कोई पर-अपेक्षा, न टूटने का भय होगा,

अविचल आनंद का सागर, वहीं चिर-विजय होगा।

© अभिषेक तिवारी

Tuesday, 2 April 2024

मुक्ति मार्ग

मनुष्य का कर्म अच्छा या बुरा नहीं होता "कर्म" होता है, सद्गुण या दुर्गुण नहीं होता "गुण" होता है, कि सद्गति या दुर्गति नहीं होती "गति" होती है।
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार यह मनुष्य के स्वाभाविक गुण है परंतु समाज में स्वीकार नहीं तथा इन्हें अवगुण की संख्या दी गई है। इसका कारण यह माना जाता है की इन गुणों के कारण समाज के अन्य लोगों को हानि हो सकती है या किसी के मूल अधिकारों का हनन हो सकता है।
आत्मा के सात मौलिक गुण जो बताए गए हैं पवित्रता, शान्ति, प्रेम, सुख, आनंद, शक्ति व ज्ञान यह मनुष्य के मौलिक गुण है ही नहीं अपितु यह किसी भी एक स्वाभाविक गुण (काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार) के चर्मोत्कर्ष पर जाने अथवा इन पांचो गुणों को पूर्ण रूप से नियंत्रित करने के पश्चात मिलने वाले उपहार हैं।

उपहार प्राप्तकर्ता को तत्वज्ञानी, बोधिसत्व, एनलाइटेंड  आदि संज्ञाऐं दी गई है।  बड़े - बड़े ऋषि महात्मा, संत,धर्मात्मा, योगी आदि ने अपने स्वाभाविक गुणों  पर नियंत्रण प्राप्त कर ये उपहार प्राप्त किया। 

अब विडंबना ये है कि कई सारे  राक्षस, दानव, दुरात्माओं आदि ने अपने एक ही स्वाभाविक गुण को चरमोत्कर्ष पर पहुंचाकर यह उपहार सहज ही प्राप्त कर लिए। रावण, दुर्योधन, कंस आदि कई उदाहरण हैं जिन्होंने आत्मा के मौलिक गुणों को प्राप्त किया अर्थात मुक्त हो गए।
आत्मा के मौलिक गुणों (पवित्रता, शान्ति, प्रेम, सुख, आनंद, शक्ति व ज्ञान) को प्राप्त कर लेना ही मुक्ति है।

Sunday, 3 May 2020

विरह

जाने कैसे कटेगी,
अँधेरे अकेले घर में, अँधेरी अकेली रात


कितने दिनों बाद हुई थी, आज तुमसे मुलाकात


चारों ओर सन्नाटा था तुमने भी  ना छेड़ी कोई बात


मैं तो निःशब्द था लेकिन तुम?


तुम तो पलकों से  ही कितने राज खोल सकती थी  


आँखों से तो तुम बोल सकती थी।


तुम्हारी झुकी आँखों में अब भी वही हया की लाली थी


लेकिन पलकें साध ली थी तुमने, क्या कोई राज छुपा के लाई थी?


इस अँधेरी अकेली रात में क्या कहने आई थी?


तुम मेरा ख़्वाब थी या कि मेरी तमन्ना


या थी कोई आसमानी परी जो आई थी,


मुझसे अपनी तनहा रातों का हिसाब माँगने।


जिन रातों में तुम्हारा पूरा शरीर विरह से तप रहा होता था


और मैंने तुमसे आँख तक ना मिलाई थी।


हाँ तुम हिसाब मांगने ही आई थी


या शायद विरह की तपन का एहसास कराने


जिसमें न जाने तुमने अपनी कितनी रातें झुलसाई थीं।


तुमने आते ही स्याह रात में चाँदनी सी बिखेर दी 


तुम्हारी खुशबू ऐसी थी मानो


धूप से जलती हुई धरती पर बारिश की ठंडी बूँदों ने मरहम लगा दिया उस सोंधी खुशबू की मदहोशी में मैं तुम्हारी आंखों में डूब रहा था कि तुम्हारी पलकों ने एक पहरा सा लगा दिया


और तुम ऐसे ओझल होने लगी मानो यह रात, रात थी ही नहीं


यह कोई ग्रहण था जिसने सूरज को भी अपने आगोश में भर लिया था तुम जा चुकी थी, ऐसे कि जैसे कभी आई ही ना हो


अब यहाँ केवल मैं हूँ और कुछ मौन सवालात


जाने कैसे कटेगी अँधेरे अकेले घर में अँधेरी अकेली रात।


©अभिषेक तिवारी।

Thursday, 25 July 2019

आस्था और अंधविश्वास

अंधविश्वास का प्रादुर्भाव आस्था से ही हुआ है।
वैसे अंधविश्वासी हम सभी होते हैं अपने माँ, पिताजी, परिवार, गुरुजी के प्रति।
ईश्वर के प्रति आस्था आखिर कहाँ से जगी हमारे मन में सोचा है किसी ने शायद दादी और नानी की कहानियों से या फिर माँ के हर मंदिर और मूर्ति के सामने "भगवान जी को जय करलो" वाले वाक्यों से।
ये घर वालों के प्रति हमारी आस्था थी या अंधविश्वास की उन्होंने जो बताया हमने सच मान लिया। उस समय हम कर भी क्या सकते थे हमारे पास अपना विवेक तो था नही।
अतः बिना विवेक की आस्था ही अंधविश्वास है।
आज भी हम लोग धार्मिक कार्यों में अपना विवेक नही प्रयोग करते या करना ही नही चाहते शायद तर्क से आस्था में चोट पहुँचती है। लेकिन मेरा मानना है कि खूब तर्क करिये अपना विवेक इस्तेमाल करिये याद करिये महाभारत के उस अर्जुन को जिसने कृष्ण को सर्वेस्वर जानते हुए भी तर्क किया और पूरी तरह संतुष्ट हो कर ही उनकी बातों को आत्मसात किया। हमारे पुराण और उपनिषद भरे पड़े हैं ऐसे ही तर्कों से। किसी भी धार्मिक अनुष्ठान से पूर्व उसका कारण जानें अगर आपके विवेक से वह कारण सही है तो आस्था और यदि बिना विवेक इस्तेमाल किये कर रहे हैं तो अंधविश्वास है ।
मेरी आस्था है राम, कृष्ण, महादेव के दिखाए गए रास्तों में उनकी शिक्षा में न कि अंधविश्वास है कुछ लोगो द्वारा उनको प्रसन्न करने के बताये गए तरीकों में।

- अभिषेक तिवारी

Sunday, 21 July 2019

तुम मेरी हार हो।

तुम मेरी हार हो
हार हो तुम मेरी
लेकिन तुम्हें हम एकदिन
जीत कर दिखाएँगे
न सोचना तुम कभी
कभी तुम न सोचना
पुनः हम वह प्रणय गीत दोहराएँगे
तुम चली जाना अपने घर को
तुम्हें हम कभी ना बुलाएँगे
तुम्हारे रस्ते के सारे कंटक
हम स्वयं ही हटाएँगे
मुस्कुराती रहो सदा
उसके सारे जतन कर जाएँगे

लेकिन सुनो जब मेरे मन के घाव चिल्लाएँगे
रिस-रिस कर यह मेरे तन को जब पिघलाएँगे
तब तुम्हारी आंखों के आँसू भी न रुक पाएँगे
जीवित तो होगी तुम कहीं
लेकिन चित्त तुम्हारे भी न रह पाएँगे
केवल मेरे ही किस्से और कथानक याद आएँगे
देखना तुम मेरे बाद से प्रेम के सारे मानक बदल जाएँगे
आग मुझ में लगेगी और लोग तुमसे जल जाएँगे
आग मुझ में लगेगी और लोग तुमसे जल जाएँगे
तुम मेरी हार हो, हार हो तुम मेरी
लेकिन तुम्हें हम एकदिन जीत कर दिखाएँगे

-©अभिषेक तिवारी

Wednesday, 13 February 2019

लड़की

माँ, बाबा, भैया सबसे दुलराती
गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचाती
खाना पकाती, सबको खिलाती
बर्तन भले ही छोटे हों,
लेकिन सबको बराबर भोग लगाती।
कभी मिट्टी के बर्तन बनाती,
कभी मास्टरनी बन सबको पढ़ाती
खूब धूम मचाती, कभी-कभी स्कूल मोहल्ले में लड़ भी आती-
भाई को मारा, बहन की चुटिया खींची थी
माँ, उसने बाबा को गाली दी थी
संग न जाने कितने बहाने लाती।
माँ गुस्साति, बाबा को हँसी आ जाती।
ऐसे ही एक रोज़ माँ को2 खूब गुस्सा आया
हाथ पकड़कर उसने समझाया-
ऐसे लड़ेगी-भिड़ेगी तो ब्याह कौन करेगा?
कूदती-फिरती है दरवाज़े पर सारा दिन ये समाज क्या कहेगा?
पराया धन है तू, सब पूछेंगे माँ ने तेरी नही कुछ सिखाया?
आज थोड़ी सहम गयी, हाथ झटक कर फिर भी निकल गयी।
एक शाम, था साखियों संग खेलने जाना,
फुदकती हुई निकल रही थी कि ठिठके कदम सुन माँ का कहना
अरे! ये तूने क्या है पहना, नही पता लज्जा है स्त्री का गहना।
माँ, मैं तो बच्ची हूँ, क्यों पहनूँ स्त्री का गहना
मान मेरा कहना, बच्ची नही रही अब तू बड़ी हुई
माँ, कल तक तो थी बीमार मैं बिस्तर पर पड़ी हुई
सहसा क्या हुआ जो एकदम से बड़ी हुई।
बहस मत कर, अब तुझे डरना होगा
अपने ही घर दुपट्टा लगा कर चलना होगा।
पलकें झुका कर धीमे-धीमे तू चलना
न राह में तू किसी से बातें करना।
उम्मीदी आँखों ने बाबा की ओर देखा एक बार
लेकिन बाबा ने भी फेर लीं नजरें इस बार।

अब हुई झील सी शांत, जो थी नदियों सी चंचल
आँखों में समेट समंदर, करती न नदियों सी भी कल-कल
अब भीड़ से डरा करती है, पलकें झुका कर ही चला करती है।
जब भी अकेली होती है, जाने क्यों सहमी होती है।
कपड़े भी अलग हो गए इसके बड़े-बड़े शूट पहना करती है
संभलता नही दुपट्टा पिन से साध लिया करती है
समाज की नज़र से खुद को बचाती फिरती है।
अब रखती है बन्द करके अपने भी कमरे की खिड़की
हाँ ये है वही लड़की।
हो गयी अपने ही घर मे परायी
लगा, न सगे रहे अपने ही माँ, बाबा और भाई।

सबको समाज का बड़ा मान था
क्या उनको न इस बात का भान था
कि रहती सदा गिद्धों की नज़रें, निरीह पड़े मांस पर
चीलें भी करती शिकार, सहमी चुहियों पर घात कर।
है समाज भी इन चील-गिद्धों से भरा पड़ा
कोई न बोलने को यहाँ अब खड़ा,
जब इसके घर पर ही गिद्ध मँडराते हैं,
खुद को घर वालों से भी सगा जता उसको फुसलातें हैं
दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार का भेष बना कर आते हैं
अपनी मीठी बातों से निर्मल हृदय में एक विश्वास जगाते हैं
अपने छल को प्यार नाम दे हसीं सपने खूब दिखाते हैं
और यूँ ही हँसते मुस्कुराते एक दिन घात कर जाते हैं।
उसी समाज के सामने फिर उसको लाया जाता है
क्योंकि अब प्रश्न सामाजिक न्याय का आता है
घर-परिवार, प्यार, संस्कार सब घसीटा जाता है
पुनः समाज को न्याय का अवतार बताया जाता है।
दी जाती है दलीलें जो माँ-बाबा नही सुन सकते
कि वे तो गिद्ध हैं अपना स्वभाव कब छोड़ सकते
माँस खा कर उड़ जाना उनका धर्म है भला कैसे विमुख हो सकते।
गिद्धों का तो दोष नही, यह तय रहा
लेकिन न्याय में तो अब भी संसय रहा
हुआ है समाज का अनादर सजा कोई तो पायेगा-
गुमनामी में वह परिवार जिएगा और जिस भी घर बैठा गिद्ध वह घर ही छोड़ा जाएगा।

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 28 September 2018

अंतःद्वंद

मुद्दतों हुए ख़ुद से मिले, जाने कहाँ भटक रहा हूँ।
आग का दरिया है या समंदर, जल रहा हूँ या गल रहा हूँ
या कि खो गया हूँ किसी निर्वात में
साँसे तो हैं पर कोई आवाज़ नही
दिल तो है पर पूरे जज़्बात नहीं
कुछ ख़्वाहिशें भी हैं पर उनमें वो बात नही
अब धड़कनें भी कुछ नही कहतीं उनमें भी कोई राज़ नही
फिर भी मुस्कुरा रहा हूँ, हर रिश्ता निभा रहा हूँ
मैं अपना ग़म स्वयँ से ही छिपा रहा हूँ।
शायद स्वप्न में हूँ, कोई भी बन्धन नही तोड़ पा रहा हूँ
या कि कमज़ोर हो गया हूँ, स्वयँ का भी बोझ नही उठा पा रहा हूँ लेकिन,
कमज़ोर होना तो मेरी फितरत ही नही, मैं क्या से क्या हो रहा हूँ
मुद्दतों हुए ख़ुद से मिले, जाने कहाँ भटक रहा हूँ।

कब और कैसे भटका, अब खोज़ रहा हूँ मैं
क्या, कब, कहाँ और क्यों, इन प्रश्नों से उलझ रहा हूँ मैं
ख़ुद से कब मिलूँगा, अब सोच रहा हूँ मैं लेकिन,
भटकना तो फितरत है मेरी, फिर क्यों डर रहा हूँ मैं
शायद यही ज़िन्दगी है और मौज कर रहा हूँ मैं।
नही खोया निर्वात में ना ही स्वप्न में हूँ
इसी दुनिया मे हूँ और दुनियादारी सीख रहा हूँ मैं।

- अभिषेक तिवारी

Monday, 29 January 2018

कॉन्फेशन

क्या हाल भाई लोग, सब ठीक - ठाक ?
अबे यार तुमलोगों को कुछ बताना था बे- साला सोचे थे, सबसे पहले बाहर निकल रहे हैं, मस्त इंजीनियर डॉक्टर टाइप यो-यो दोस्त बनाएँगे। लेकिन का करें - 'शार्ट हैण्ड जब लिखा लीलारा, तव का करीहें अवधेश कुमारा'।
तुम लोग रह ही गए बे, सही कहें तो पीछा ही नही छुड़ा पाए भाई।
नही, मतलब देखो कौनो साला काम का है ?
सब क्युटिया टाइप हैं, लेकिन पता नही क्यों ये बात साला कौनो और बोल दे तो बर्दास्त से बाहर हो जाता है। मन करता है "रेन कम वॉटर कम" कर दें।
साला बहुत घूमे बे कहाँ - कहाँ नही गए लेकिन घूम फिर के तुम्ही लोगो मे रह गए यार । साला हऊ का कहते हैं - एक्सेंट, तक नही सुधरा जहाँ जाते हैं लोग पूछ देते हैं भाई गोरखपुर साइड के हो क्या ?
शुरू में जब ईगो पे ले लीये थे तब तनी बुरा लगता था कि पहिचाना कैसे बे, बोल तो हम हिन्दीये रहे थे।
लेकिन देखो साला यहां भी खेल गयी किश्मत आज जब कई भाषा पढ़ लिए, अरे भाषा छोड़ो यहां कई सेमेस्टर लिंगविस्टिक पढ़ने के बाद अब लगता है कि यार जो मज़ा खींच के बोलने में हैं उ कहीं और, है नही।
एकाध समय फॉर्मेलिटी में छोड़ दें तो गुरु अब हमशे हो भी न पाएगा।
बड़ा दम लगता है यार बना के बोलने में मज़े नही आता हऊ का कहते हैं फील नही आता, नेचुरल फ्लो नही आता।
आ जिसको ई नेचुरल फ्लो पसन्द नही आता उ हमको पसन्द नही आता।
तुमलोग साला प्यार नही मजबूरी हो बे कोनो और टाइप वालन से ज्यादा जमता ही नही। अउर तुम लोगों से जल्दी खटकता ही नही आ कब्बो खटक जाए साला तो साला डर लगता है अलग से कि बेटा महफील में बहुत मौज ली जाएगी।
और हऊ कहावत 'हम' जोन कहते हैं, "महफील का फूफा होने से अच्छा मजबूरी का गांधी बन जाओ।"  बस इसी
का पालन कर के दाब लेना ही बेहतर समझते हैं।
का किश्मत है हमारी, इत्ते रात गए जब दुनिया बाबू सोना कर के सो गई है  या सोने वाली होगी तब साला तुम लोग की याद आ रही है, कि कितने बड़े वाले हैं सब
कब्बो नही सुधरेंगे सब।

बेटा आज फ्लो में हैं चाहें जित्ता लिख दें, लेकिन का फायदा किसके लिए लिखें साला पढ़ेगा कौन, जिनको पढना है साला स्क्रोल कर - कर के नीचे खोज रहे होंगे -

"देखबे बे कोनो के बड्डे ह का मोटका बड़ा ढेर लिख देहलस।
ना बे आज-काल ढेर ज्ञान देता उ।
जानत नइखे- ओकर कारे इहे ह।
हाँ उ नशीहत देके दुनिया के अपने सुत्तल होइ।
ई बात सही कहले ह।
का बात कर ताड़े सही में?
फोन करबअ सो।
का फायदा, उठइबे ना करी।
चल सो घरवे ओकरे।
ए मह तोहनी के चला जा तनी हम आवतनी घरवाँ से होके।
तोहरा ढेर कार रहेला, चुपचाप चलअ नाटक न बतियावअ।
हाँ बे चला सो कही घूमे चलेके- पनियहवाँ चले के?
हाँ बे हम आज ले ना गइल बानी ।
तू रहेदअ तोहरे मान के नाही बा।
आज केकर खर्चा बा।
बेटा तोहके बड़ा ढेर फिकर रहता,
का बनवावअ तड़अ?

अभिषेक ,अभिषेक , बाड़ा हो ,केतना सुतबअ ए मह ?
छोटू, छोटू... ,उठ बे, का बाबू रात भर जगाई भइल है का?"

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 28 July 2017

मुझे जीना नही आता

मुझे जीना नही आता,
ज़िन्दगी जब तक मुझे एक दो पठखनियाँ नही दे देती मेरी धमनियों में उबाल नही आता,
पठखनी दर पठखनी ससख्त होता जाता हूँ।
फिर ज़िन्दगी अपनी शर्तों पर जीने निकल पड़ता हूँ,
बेख़बर बेपरवाह तब तक जब तक, ऐ ज़िन्दगी फिर कोई करारा जवाब नही मिल जाता।
-
अभिषेक तिवारी।

मुझे प्रेम करना नही आता

मुझे प्रेम करना नही आता, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही रहता स्वयं पर नियंत्रण अपराधबोध से दब सा जाता हूँ।
न जाने क्यों धमनियों में अंगार दौड़ने लगता है और फिर अचानक लगने लगता है कि - काश! तुमसे मिला ही न होता, न की होती कोई बात, न दिखाए होते दिल के जज़्बात।
मैं तुझसे तू मुझसे बेख़बर, करते हम स्वप्न ही में बात।
नही देना होता बोल - बोल कर प्रेम का प्रमाण, चुप-चाप बिन कहे ही रखता ख़्याल तुम्हारा, ना तुम मुझे बदलती न मैं तुम्हे बदलता बस एक मुस्कान पर तुम्हारी ये दिल पतझड़ के सूखे पत्तों सा बिछ जाता।
नही आता मुझे रूठना - मनाना और ना ही तुम्हारी सुंदरता के कशीदे पढ़ कर सुनाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुनकर ग़ुस्सा बहुत आता है।
खो देता हूँ अपने को अपने आप से, आँखों से आँसू भी नही आते, शायद भाप बन जाते हैं शरीर के ताप से।
एक ज्वाला सी उठती है मन मे और जला देती है स्वप्न सारे, दिन रात लगने लगते हैं किसी शाप से।
नही आता दिल चीर कर सिया- राम दिखाना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।
नही आता सब कुछ अर्पण कर तर्पण करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है
मुझे नही आता प्रेम करना, हाँ लेकिन सुनो प्रिये तुम्हारी रुआँसी आवाज़ सुन कर ग़ुस्सा बहुत आता है।

-
अभिषेक तिवारी

Friday, 27 January 2017

मैं सच बोलता हूँ।

जी हाँ, मैं सच बोलता हूँ।
सुनता कोई नहीं फिर भी रोज बोलता हूँ।
पत्थरों में भगवान देखता हूँ लेकिन इंसानो में नाम देखता हूँ।
कभी धर्म देखता हूँ कभी जाति देखता हूँ, कभी रंग देखता हूँ कभी ढंग देखता हूँ।
मैं न कर्म देखता हूँ न ईमान देखता हूँ,
क्यों न मैं इंसानो में इंसान देखता हूँ?
सबको मैं कई तरह से कई बार तोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हर रोज़ एक स्वप्न देखता हूँ, स्वप्न में सारा जहाँन देखता हूँ और स्वयं को ही सबसे महान देखता हूँ।
सारा जहाँन देखता हूँ स्वयं का छोड़ सबका मकान देखता हूँ।
सबकी जीत देखता हूँ, सबकी हार देखता हूँ,
मैं न स्वयं के ह्रदय की रार देखता हूँ,
क्यों न मैं सब के घर को अपना मकान देखता हूँ?
मैं तो सब के घरों में झांक सभी के राज़ खोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

आ गए चुनाव मैं इनका उनका सबका खाता हूँ,
मिल जाये कुछ तो घर भी लाता हूँ।
न दल देखता हूँ न व्यापार देखता हूँ,
न विचार देखता हूँ न सम्मान देखता हूँ।
मैं धर्म और जाति में ही सबकी पहचान देखता हूँ,
क्यों न मैं सभी दलों के काम देखता हूँ?
अजी आप दाम तो बोलो मैं तो स्वयं को ही मोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

हुआ बेटा नगाड़े बजा मिठाई बाँटता हूँ,
हो गयी बेटी जो मुँह बना कर्ज़ माँगता हूँ।
कभी परंपराओं तो कभी समाज को कोसता,
निज दोष न पाता, स्वयं को समाज से अलग सोचता हूँ।
बेटी को बेटे से कम देखता हूँ,
क्यों न मैं बेटा-बेटी एक सम देखता हूँ?
अजी छोड़ो भी, मैं तो इंसान हूँ स्वयं को छोड़ सबको टटोलता हूँ,
जी हाँ मैं सच बोलता हूँ।

- अभिषेक तिवारी।

Friday, 7 October 2016

प्रेम में मिलन

उधेड़बुन में हूँ कि क्या मिलना भी उतना ही रोमांचकारी होता होगा,
जितनी कि कल्पनाएँ होती हैं।
चकोर को चाँद मिल जाए तो क्या होगा ?
शायद कुछ नए प्रतिमान बनेंगे।
परंतु क्या ये प्रतिमान चकोर की वर्षों से की तपस्या से न्याय कर सकेंगे ?
क्या सुदूर चाँद के प्रति चकोर के उस निश्छल प्रेम को मिलन के प्रतिमानों में बाँधा जा सकता है ?
मिलन प्रेम की परिणति हो ही नही सकती
तभी तो राधा-कृष्ण ने चाँद-चकोर ही रहना स्वीकार कर लिया।
सीता ने भी राम से अलग होकर ही अपने प्रेम को अमर किया।
प्रेम में मिलन तो एक आकांक्षा मात्र है, एक अनन्त की भाँति, जिसे मिलन के प्रतिमानों में बाँधा ही नही जा सकता।
प्रेम अनन्त है और यदि प्रेम की परिणति मिलन है,
तो वो कैसा अनन्त जिसका अंत मिल गया हो।

- अभिषेक तिवारी।

Monday, 3 October 2016

मिलन

एक शख़्स जाना-पहचाना सा पर शख़्सियत अनजानी सी।
कई वर्षों से ढूंढ़ रहा था जिसको मिलना है अब उसको।
क्या कहूँगा उसको मिल न पाया आज तक स्वप्न से बाहर जिसको।
बहुत कुछ सोचा है: उर का हर एक स्पंदन सुना दूँगा उसको।
कहूँगा देख प्रिये! न डिगा पाई ये लम्बी प्रतीक्षा भी मुझको।
और बहुत कुछ है कहने को पर अब सोच-सोच कर बोलना बेमानी लगता है।
केवल उसके अन्दाज़-ए-ज़ुस्तज़ु को ही देखा था नही कर पाया था कभी गुफ़्तगू शायद इसीलिए ये आसमानी लगता है।
वो ललाती साँझ के नभ की अकेली तारीका सी थी, और आज पावस की सजला बदली सी मेघमय आसमान से उतर कर बढ़ रही है मेरी ओर।
पर न जाने क्यों अब भी कटी पतंग सी लग रही, नही है जिसकी मेरे पास कोई डोर।
शायद अब भी वो एक चाँद है और मैं एक चकोर,
मिलन संभव नही, बढ़ रहा हूँ अब भी एक अनंत की ओर।
-अभिषेक तिवारी

Monday, 12 September 2016

स्त्री विमर्ष- एक अधूरी कहानी

बात कल रात की है अइसे ही बइठे थे, कुछ सोच रहे थे, आ सोच का रहे थे परेशान टाइप थे। अचानके से हमारे एक बड़े अच्छे मित्र- हाँ जी! उहे हाल्फ पाइंट वाले इयार आये, बड़े परेशान लग रहे थे बेचारे। अब हम बड़ा संकोच में कि पिछले लगन में इन्हीं भाई की शादी थी, न गइबे किये न नेवतवे भिजवाये, अब ससुरा शूरू कहाँ से करें । खैर जरूरते नही पड़ी खुदे बोल पड़े भाई अच्छा किया जो तू न आया लगन में हमारे। हमने पूछा हुआ क्या थोड़ा डिटेल में बताओ बीवी ठीक ठाक तो है न । इतना कहना था की भाई रोक नही पाये अउर दिल के अरमान आंसू नेटा सब में मिक्स हो के बहने लगे, हमने ढांढस बढ़ाने की कोशिशो की लेकिन अरमान कुछ ढेरे लग रहे थे सो हमने अपना रुमाल कुर्बान कर ही दिया, रुमाल बढ़ाते हुए बोले अब लड़कों की तरह रोओ नहीं और लड़कियों की तरह बुलंद अवाज़ में आप बीती सुनाओ।
भाई जो कहानी सुनाये हैं रोंगटवे खड़ा हो गया।
उहे सब तो सोच के परेशान बैठे थे इ मारे कि दिलवे दहला दिए...
                           
दरअसल हुआ ये था कि हम आज कल हई जो नया ट्रेंड चला है न "बहुओं से गोल्ड मांगने वाले अब बेटियों से गोल्ड की आस लगाएं हैं " टाइप मैसज इहाँ - उहाँ पहुचाने वाला उसी पर सोच रहे थे कि ससुरा इ आस कौन लगाता है या फिर ये गोल्ड कौन मांगता है, जो मांगता है उसका जेंडर क्या है साला बड़ा जुलुम हो रहा है समाज में स्त्री जाति के साथ । फिर अचानके दिमाग में आया कि गोल्ड जो लड़की वालों कि तरफ से देता है उ कौन जेंडर से है, खाली एक विशेस जेंडर को ही इन सब चीज से परेसानी हो रहा है कि सबै परेशान है।
तब्लके इ आ गए थे, अरे उहे हमारे मित्र जो अपना अरमनवा नही कंट्रोल कर पाये थे।
हुआ इ था उनके साथ कि शादी तय हुई थी इनकी 5 लाख नकद और 1 कार पर और जब तिलक चढ़ा तो कार तो मीले गया लेकिन नक़दी का कोनो बाते नही हुआ। अब बबुआ की मम्मी मुँह फुला के बैठी थीं कुछो नीक नही लग रहा था न साड़ी कपड़ा न फल फूल मिठाई। जइसे तइसे बबुआ के पापा समझाए त मने तिलक चढ़ा । लेकिन बबुआ के मम्मी का फ़ाइनल वाला डेसीजन था अब लइका हमारा तब्बे द्वारपूजा पे बैठेगा जब नकद गिना जायेगा। इधर बाबू त फोने पे चालू थे "मेला बाबू मेला सोना" 7 कसम त छोड़िये इ 72 गो ले कसम खा चुके थे । जोन हिसाब से बता रहे थे बड़ी गहरा प्यार हुआ लगता था, लेकिन भईया अब मम्मी के आगे थोड़े न बोल सकते थे कुछु।
बियाह वाला दिन पहुँचे हुआँ जनवासे पे सब लोग, आ हुआ समधी जी लोग में एक जोड़।
बबुनी के पापा बबुआ के पापा से बोले हम 5 लाख और गाड़ी कहे थे त गाडी दे दिए और बियाह में खर्चा आ तिलक का सामान ले के कुल 4 से उप्पर गिर गया है तब्बो 1 लाख दे रहे हैं रख लीजिये आ चलिए दरवाजे पे। अब बबुआ के पापा का तो मानो तारे छोड़ दिया हो कुछ समझ नही आया तो निकाले मोबाईल मिला दिए बबुआ की मम्मी को और फ़ोन आ पकड़ा दिए समधी जी को, लीजिये तनी जवन हमसे कहे हैं उहे बतिया दोहरा दिजिये।
उधर बबुआ सोच रहे थे कि जोन कपड़ा पहिन के परछावान करवाये हैं ओही पे जयमाल कराएं कि बदल लें फेर सोचे जुठहि दिमाग लगा रहे हैं फोन मिला ही लेते हैं, अरे उहें- "मेला बाबू मेला सोना"।
आ फोन मिलाये आ मिला भी, लेकिन आवाज़ बड़ा धांसू टाइप था एकदम लड़की वाला बुलंद आवाज़, "कुछो मर्दानगी है कि नही आप में कि जिंदगी भर मम्मी का अँचरा पकड़ के ही बैठना है अरे बियाह आपको करना है आ हम पसंद हैं तो बार बार मम्मी को काहे पूछ रहे हैं" टूँ टूँ टूँ ... फ़ोन कट गया।
आ उधर समधी लोग मारे पशीना के भींज रहे थे ।
बबुआ के पापा बोल दिए थे की जवन बतियाना है मैडम से बतिया लीजिए हम नही जान रहे हैं कुछो।
बबुआ को अपने बहिन से पता, लगा मामला पूरा मिलाये फ़ोन मम्मी को अपने आ कहे काहे परेसान हो मम्मी हम कमा रहे हैं न का गम है इन लोग के पैसा पे थोड़े जिनगी कटेगा।
अब मम्मी पूरा फॉरम में, हमारा एक्के बेटा है नही लेंगे त दू - दू  गो बेटी का बियाह करना है कैसे होगा। भुला गए आये थे लोग तिलक में त कह गए थे लोग कि 'सहाना' में कमी नही करियेगा आँगना में सब रिस्तेदार सब रहेगा इज्जत अब आपे के हाथ में है त 3 लाख का गहनवे बनवा दिए 1 लाख का साड़ी भेजे हैं 5 लाख तिलक में खर्चा हो गया
आ अभी सब रिश्तेदार का बिदाई बकिये है। तुम चुप चाप कान खोल के सुन लो...
जब तक पइसा पूरा नही गिना जाता तब तक नही जाना है दरवाजे पे ।
अबे इ सब खेला हो ही रहा था कि एक गाड़ी भर के नारी शक्ती पहुँच गयी जनवासे पे। बबुआ आ बबुआ के पापा पेश हुए, बताया गया कि इ बबुनी की मौसी हैं आ जिला महिला प्रकोष्ठ की नेता हैं। बबुआ के पापा बोले कोनो पकोष्ठ के नेता हो पैसा दिलवा दें राज़ी ख़ुशी बियाह हो । अब ता नेता जी का चेहरा लाल बोल पड़ी अभी जान नही रहे हैं आप लोग हम कौन हैं मेरी बेटी की शादी है इसीलिए अभी तक चुप थे लिकिन आप लोग ता सर पर चढ़ रहे हैं। चुप चाप दरवाजे पे चलिए शादी करीये खाना खाइये और बहू को बिदा करा के घर ले जाइये। बबुआ चुपचाप तमाशा देख रहे थे कि बबुआ का मोबाइल बोला निकाले तो देखे मम्मी का फ़ोन था । फ़ोन उठाये ता एक्के आवाज सुनाई दिया गिना गया का पैसवा, जी अभी नही मम्मी, अभी बात चल रहा है। बात का करना है वापस ले आओ बारात तानी दो त फोनवा अपने पापा को, "काजी का बतिया रहे हैं पैसा दें ता ठीक नही तो वापस आइये", इ बोले, तुम नही समझ रही हो अब जब पैसा का जुगाड नही किये हैं ता कहाँ से इ बेरा ले आएंगे अब्बे 1 लाख ले लेते हैं और पैसा देंगे ता गौना करा लेंगे, का कहती हो, "जोन बुझाये तौन किजिये फेर बाद में हमसे मत कहियेगा कुछु जब सब खुदेही करना है ता हमशे का पूछ रहे हैं, गए हैं नया मर्दानी पहिन के कर लीजिये बेटा का बियाह देख रहे हैं दो - दो गो बेटी का बियाह कैसे करेंगे बिना पैसा का।"
अब ता बबुआ के पापा लाचार टाइप हो गए, आ बोल दिए अपने समधी जी से भइया पैसा का ब्यवस्था हो तो बताइये नही तो माफ़ करिये।
ऐसे कैसे माफ़ करिये निकलीं बबुनी की मौसी अपना बड़का मोबाइल आ मिलाई कही फ़ोन आ बोलीं शादी में पैसा घट गया है बिना दहेज़ शादी नही हो रही है बारात वापस जा रही है जल्दी से आइये।
अब तनी सा बबुआ के पापा के जान में जान आया चला लगता है पैसा आ रहा है।
10 मिनट में आई 3 गाड़ी पुलिस आ बाराती लोग को दे लाठी दे लाठी, बबुआ आ उनके पापा को ले गयी उठा के हुआ बियाह, बियाहे काहे गौनवो हो गया । 1 लाख मिल रहा था तौनो गया हाथ से।
अब पहुचे लोग घर ले के बहुरानी, हुआ मुलाकात सास बहू का, बुझा रहा था कि अगर शाकाहारी न होती ता चबा जातीं। अब रोज कच कच हो रहा है घर में कब्बो इ कहती है इसको मइके छोड़ आ आओ कब्बो इ कहती हैं दहेज़ उत्पीड़न लगवा देंगे।
इहे समस्या ले के हमारे पास आये थे इ हमारे मित्र। हम ता बोल दिए भैया हमको माफ़ करो इ नारी नारी का झगड़ा है खुदे सुलझा लेंगी हम बीच में पड़े तो नारी उत्पीड़न हो जायेगा।
अभिषेक तिवारी।

Sunday, 17 January 2016

मेरा मन

आज मन मेरा अनमना सा है-
जानें क्यों उद्विघ्न है यह,
डरा सा है, सहमा सा है,
याकि भरमाया सा है।
बहुत कुछ सोचता है, फिर भी अलसाया सा है,
न कुछ करता है न करने देता है,
बस कुछ किताबें कई बार पढ़ता है।
न जाने प्रश्न ढूंढता है या उत्तर,
किन्तु हाँ ऐसा बार-बार करता है।

कहीं ऐसा तो नहीं, कर्तव्य-बोध से डरा सा है,
याकि कर्तव्य के बोझ से दबा सा है,
या शायद अब भी कुछ निष्कर्स बचा है-
कि ये तो अभी बच्चा सा है...।
ज़िन्दगी के सफ़र में कई पड़ाव देखे है इसने,
कभी तो कर्तव्य-पथ से डिगा नहीं,
फिर क्यों आज इतना घबराया सा है?

कोई तो अनजाना सा है,
जिसका कि ये एहसास गुनगुना सा है,
शायद कुछ अनसुना सा है,
याकि कोई घाव दे रहा अपना सा है?
आज मन मेरा अनमना सा है,
शायद कारण ही इसका अनगना सा है,
आज मन मेरा अनमना सा है।

- अभिषेक तिवारी।

Sunday, 28 June 2015

आज देखा मैंने बारिश का आना।

आज देखा मैंने बारिश का आना
गर्म जमीं पे उतर के वह मरहम सा सहलाना
पेड़ पौधों की वो ख़ुशी, पंछियों का वह चहचहाना
आज देखा मैंने बारिश का आना।

किसान के आँखों में चमक सी आ गयी
जो ये देखा कि बदली सी छा गयी
किया था बेसब्र हो कर जिसका इंतज़ार मानो वो घड़ी आ गयी
कुछ सुर्ख हवाएँ चलीं और मौसम में नमी छा गयी
उद्देश्य था इनका सबको कुछ दे जाना
आज देखा मैंने बारिश का आना।

सबकी उम्मीदें पूरी करती इन बूंदों को देखा
बड़ी मस्तमौला बड़ी अविरल हैं ये
न किसी से कोई उम्मीद ना ही है इनकी कोई इच्छा
एक ही ध्येय है औरों के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर जाना
फिर भी न जाने क्या-क्या न सुनतीं ये जब भी गलत होता इनका पैमाना।

इन बूंदों से सीख मैं भी सबकी उम्मीदों पर न्योछावर होना चाहता हूँ
लेकिन अभी ढूँढ रहा हूँ सही पैमाना
विनती यही है जग से सब अपना सब कुछ वार दें
बिना किये कुछ उम्मीद किसी से,
लेकिन कब, कहाँ, किसको, और कितना सदा ज्ञात रहे इसका पैमाना
आज देखा मैंने बारिश का आना।
-अभिषेक तिवारी

Saturday, 27 June 2015

बीते दिन

दिल चुप है जख्म उभरने लगे हैं
ना जाने क्यों बीते दिन, फिर याद आने लगे हैं।
एक अजीब सी उलझन में है मन कुछ सोच ही नही पाता
शायद पीछे कुछ छूट सा गया है
जिसके लिए ये जख्म उभरने लगे हैं
ना जाने क्यों बीते दिन, फिर याद आने लगे हैं।
तनहाइयों में की कोशिश मन को समझाने की
और भींड में की कोशिश बीती बातें भुलाने की पर क्या करूँ,
कहीं न कहीं कोई न कोई कुरेद ही देता है इन जख्मों को
जब ये ढलने लगे हैं।
ऐ दिल तू ही बता इससे बड़ी सजा क्या होगी
अब तो जख्म देने वाले भी समझाने लगे हैं
ना जाने क्यों बीते दिन, फिर याद आने लगे हैं।
अब तो बस जी करता है रोने का पर
कमबख्त आंसू भी जाने लगे हैं।
तनहाइयों की क्या बात करें अब तो
भींड में भी अकेले होने लगे हैं।
किस से उम्मीद करें इस दुनिया में
जब खुद ही खुद से दूर जाने लगे हैं
ना जाने क्यों बीते दिन, फिर याद आने लगे हैं।
अब तो बड़ी अजीब सा सोचने लगे हैं
सोचते हैं क्यों जियें किसके लिए जियें
शायद जीने के लिए मंजिल ढूँढने लगे हैं।
ना जाने क्यों बीते दिन, फिर याद आने लगे हैं।
-अभिषेक तिवारी